रचयिता - प्रशान्त राय "प्यासा"
ताहि तरे मेरो त्रुटी , जग का करि कल्याण |
प्यासा सुमिरि आपको , दुःख का करहि निधान||
कली खिलन को देखि के, अली करे गुंजार |
प्यासा मनु तु ना फसे , माया बंधी संसार||
ज्ञानही दीप जलाइए , भक्ति गंध उपजाय|
प्यासा पार्थ तु हरे , मै माया मिट जाय ||
(यंहा पे स्लेष अलंकार का प्रयोग हुआ है, -प्यासा मेरा नाम है | एक अर्थ है -भगवन प्यासा का दुःख तुम हरो और दूसरा अर्थ है - प्यासा अर्जुन के सामान है और आप सखत कृष्ण हो तो आप भी मेरे दुखो का निवारण वैसे ही करो जैसे महाभारत में अर्जुन के दुखो का किया था |)
जल जो जन्मे जलद से , जो है देतहि जान |
जो तू है जनजाति का, जिव का करि सम्मान ||
प्रेम पयोधि में पिठे, मै माया मिट जात |
जैसे डूबे जात है , हरि धनहि को पात ||
कीट आदती छाडि के , बकुल ध्यान लगाय |
साँप छछूंदर जो निगले, प्राण विहीन हो जाय ||
कुछ शेर
प्यास लेकर प्यासा बैठा है गुमशुदा ,
ख़ुदा से यंही मिन्नत , रौशन जिगर करे |
प्यास लगती रही , प्यास पीते रहे ,
रोज जीते रहे , रोज मरते रहे |
मन की आँख से ही बगावत रही,
प्यास लेकर कंही पैर तड़पते रहे|
गैरों को अपना बनाने में समय लगता है , प्यार का फ़र्ज़ निभाने में समय लगता है,
स्वप्न के गोद सो लेना तो सहज है लेकिन, आँख तक नींद आने में समय लगता है|
रात अभी पुरी बाकी थी, कारवां निकल पड़ा था,
सुबह जब होने को आया , तुब तक मै लुट चुका था|
किसी को न सोने के फुर्सत है , किसी को न सोने से फुर्सत है ,
सोओ तो ऐसे सोओ कि - गाफिल-ऐ-जमाना याद करे |
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
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